शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

649-"मेरे काव्य और तुम्हारी कविता"

"मेरे काव्य और तुम्हारी कविता"

मेरे काव्य के अक्षर 
तुम्हारी कविता के अक्षरों से मिलकर 
रचना चाहते है नए नए शब्द 
मेरे काव्य के शब्द तुम्हारी कविताओं के शब्दों से 
जुड़कर सृजन करना चाहते हैं नूतन छंद
क्या उसका यह प्रस्ताव तुम्हारी कविताओं को हैं पसंद
यहाँ पर हम दोनों के अनुपस्थित हैं रूप और रंग
मेरे काव्य की आत्मा और तुम्हारी कविता की रूह
का मिलन तो हैं संभव
तुम्हारी कविता के ह्रदय के पन्नों पर
मेरे काव्य को लिखने दो
मेरे काव्य के मन के कोरे कागज पर
तुम्हारी कविताओं को छपने दो
तभी तो प्रगाढ़ हो पायेगा उनमे परस्पर संबंध
शायद हम दोनों की रचनाओं के वाक्यों को
एक दूसरे की तलाश थी
जबसे उनका लिखना हुआ था आरंभ
विरह में तुम और मैं रहे भले
पर मेरे काव्य और तुम्हारी कविता तो
इस तरह से सदा रह पायेंगे संग
किशोर

648-"क्या सच मे सब छाया हैं ,क्या सच मे सब माया हैं "

"क्या सच मे सब छाया हैं ,क्या सच मे सब माया हैं "
जबसे तुम मुझे छोड़ कर गयी हो 
विरह के एक गीत को 
मैंने आजीवन गाया हैं 
सब छाया हैं सब माया हैं 
तुम्हारी रूह की परछाई से मेरी रूह की परछाई का 
मिलन हुआ था कभी
आत्मा अमर हैं मरती तो सिर्फ काया हैं
सब छाया हैं सब माया हैं
इस दुनिया को त्यागकर जो चला गया
वह कब लौट कर आया हैं
सब छाया हैं सब माया हैं
मेरे मन मे क्यों तुम्हारी छवि हैं
मेरे ह्रदय में क्यों तुम्हारा प्यार बस गया हैं
तुमने मुझे जो गीत सुनाया था
उसे मेरे ओंठों ने आज फिर गुनगुनाया हैं
क्या सच मे सब छाया हैं ,क्या सच मे सब माया हैं
किशोर कुमार खोरेन्द्र