मंगलवार, 18 जून 2013

644-प्यार मे .......

प्यार मे .......

तुम्हारी और मेरी कलम की स्याही
तुम्हारी नर्म और मेरी सख्त उंगलियाँ
तुम्हारे स्नेह और मेरे प्रेम से युक्त शब्द
तुम्हारी गंभीर और मेरे शोख से वाक्य
तुम्हारे पूर्ण विराम और मेरे अर्ध विराम
सभी ...आपस में मिलना चाहते हैं
तुम्हारे अव्यक्त और मेरे अभिव्यक्त विचार
आपस मे सहमत होना चाहते हैं
तुम्हारी दिव्य आत्मा और मेरी रूह
क्षितिज की सीमा रेखा के उस पार
सघन वन मे ......
सागौन के वृक्षों की परछाईयों की तरह ...
विभिन्न मुद्राओं मे नृत्य करना चाहते हैं
नभ को स्पर्श करती हुई सी ...
साल के दरख्तों की उंचाईयों को
अपनी आँखों से छूना चाहते हैं
हम दोनों एक लम्बी राह के व्यापक सूनेपन मे
गुम हो जाना चाहते हैं
किसी कन्दरा के अन्धेरें के भीतर
सदियों पूर्व से उपस्थित रोशनी के
इन्द्रधनुषी आँचल को ओढ़ लेना कहते हैं
जामुन के पेड़ पर स्थित
एक आशियाने मे चिड़ियों की तरह फुदकना चाहते हैं
समय की नदी की पहली लहर के द्वारा
रेत पर अंकित की गयी
लहराती सी प्रथम अमिट वक्र रेखा पर
सवा आखर तुम ..सवा आखर मैं
लिखना चाहते हैं ..
क्या तुम ...और मैं ...?
सचमुच ऐसा चाहते हैं ...
प्यार मे तो ..ऐसा ही होता हैं ना
किशोर कुमार खोरेन्द्र