मंगलवार, 18 जून 2013

643-मुख़्तसर सी बात हैं

मुख़्तसर सी बात हैं

तुम्हारे रूह की परछाई
और मेरे रूह का साया ...दोनों हैं संग
अब न इश्क की कोई सीमा हैं
न प्रेम मे कोई प्रतिबन्ध
न कोई शर्त हैं न कोई अनुबंध
न सतरंगी माया हैं
न काया की तरुणाई का कोई प्रलोभन
बस बजाअत हैं।।।।
और दूर दूर तक हैं उसकी बजाहत
मुख़्तसर सी बात हैं ....
रुखसत नहीं होंगे कभी हम
किशोर

बजाअत =पवित्रता ,बजाहत =प्रसार ,मुख़्तसर =सार रूप मे

कोई टिप्पणी नहीं: