मंगलवार, 18 जून 2013

642-हरीयाली का गीत"

हरीयाली का गीत"

आषाढ़ की बूंदों से
नम हुए धरती के ओर छोर
लिखने आयी हरीयाली का गीत
हर आँगन मे ,खेतों मे ,वन मे
मेघों को पार कर सुनहरी किरणों की नोक
नव अंकुरित पौधों को लग नहीं रहा
नर्म पत्तियाँ अपने सिर का बोझ
भींगे पंख को कुरेद रहे हैं
नन्हीं चिड़ियों के चोंच
अब खाली खाली रह गयी हैं सुराहियाँ
वैवाहिक मटके और मटकियाँ ..
पर हथेलियों में अब तक रचा हैं
मेहंदी का रंग शोख
झरोखों को लांघकर आ जाती हैं बौछारें
तब सिहर उठते हैं
तरुणाई की देह के रोम रोम
धुली धुली सी लगती हैं सड़कें
इंतज़ार में ठहरे से लगते हैं प्रत्येक मोड़
ठंडी हवा का झोंका बालों को सहला जाता हैं
माटी की सोंधी सोंधी खुश्बू फैली हैं चारों ओर
इस दुनियाँ रूपी बबूल के काँटों के बीच उलझ न जाए
ऐ शाम ..कही तेरा पवित्र आँचल
तुमसे यही कह रहे हैं पंछी कर शोर
आषाढ़ की बूंदों से
नम हुए धरती के ओर छोर
किशोर
 

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