मंगलवार, 4 जून 2013

640-" साल के ऊँचे पेड़ हैं घने"

" साल के ऊँचे पेड़ हैं घने"


हर तरफ साल के ऊँचे पेड़ हैं घने
सागौन के वृक्ष नृत्य की मुद्राओं मे किनारे पर
सर उठाये ..हैं ..खड़े
दूर पर्वत की चोटी पर स्थित मंदिर मे
रंगीन ध्वजाएँ हैं फहरे
सूनी सड़क पर मील के पत्थर
स्वागत मे ..सर झुकाए ..शर्म से हैं गड़े
जाते हुए पतझड़ के मौसम की तरह
कुछ पीले पत्तें डालियों पर
न टूटने की आश लिए अब भी हैं अटके
जमीन पर क्षत विक्षत पर्णों की नसों मे
अतीत के स्मरण धूल से हैं सने
छनकर आती हुई रश्मियों के धागे
लगते हैं मानों ......
नीम की छाया के जिस्म पर
वे परिधान हो सुनहरे
वन के सीने को चीर कर बहती हुई सदियों पुरानी नदी ...
बालुओं की नर्म हथेली पर
खामोशी की एक नज्म ..अब लगी हैं लिखने
पुल पर से गुज़रती हुई शीतल हवा
मुझसे कहती हैं -
जिस पर से आज तक कोई न गुजरा हो ...
आओ ...अरण्य की उसी तन्हा पगडंडी पर ..
मैं ..और ..तुम ..चले
ऊपर नीले आसमान मे विचरण करते हुए बादल
नीचे धरती पर कानन का हरा भरा आँगन
न कोई प्रश्न ..न कोई उत्तर
आओ ...निष्काम हो निर्झर सा सतत बहे
नि:शब्द ,नि:स्वर ,निर्जन
इस महा एकांत मे
मेरा स्पंदन लगा हैं ..एकाग्रचित्त हो ..मुझे सुनने
हर तरफ साल के ऊँचे पेड़ हैं घने
kishor

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