मंगलवार, 4 जून 2013

639-मैं करता हूँ तुम्हारा सम्मान "

मैं करता हूँ तुम्हारा सम्मान "
 

न तुम्हारी तहरीर हैं मेरे पास
न तुम्हारी तस्वीर का मिलना हैं
मेरे लिए आसान
फिर भी मेरा नहीं हो तुम अनुमान
मैं एक अंतहीन प्रेम कहानी हूँ
जिसका तुम हो उनवान
मैं करता हूँ तुम्हारा सम्मान
पढ़कर तुम्हारे मन के भावों को
शब्दों के जरिये अक्षरस: करता हूँ अनुवाद
उड़ती हुई नजरों से फेर लेते हो मुझे
स्वीकारता हूँ इसे भी मैं ..
तुम्हारा मुझपर एहसान
तुम कल्पनातीत हो
इसलिए तुम अदृश्य हो या सदृश्य हो
इस बात का मुझे नहीं हैं भान
तुम्हे लिख लेने का तब भी
मुझे नहीं हैं अभिमान
मैं यदि शाश्वत प्रश्न हूँ ..
तो तुम हो उसका सम्पूर्ण समाधान
तुम्हारे ख्यालों मे खोया रहता हूँ
इसलिए तन्हा रहने पर भी
नहीं लगता मुझे
यह विशाल अन्तरिक्ष वीरान
तुम्हारी याद आते ही
मुझे यह होता हैं आभास
की
मेरे ह्रदय की झील मे
जगमगाते सितारों से भरा ...
उतर आया हैं वृहत आकाश
वियोग में निरंतर संयोग की आश
यही हैं मेरा स्वाभिमान
न तुम्हारी तहरीर हैं मेरे पास
न तुम्हारी तस्वीर का मिलना हैं
मेरे लिए आसान
फिर भी मेरा नहीं हो तुम अनुमान
*किशोर कुमार खोरेन्द्र

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