मंगलवार, 4 जून 2013

638-"तुम हो "

"तुम हो "

तुम हो मेरे मन का
पावन विचार
इसीलिए
यह कायनात लगता नहीं मुझे वीरान
जल उठे हैं
तुम्हारी खूबसूरती के अनंत चिराग
सांसों में हैं खुश्बू ए निगार

यादों के उपवन मे
खिल आये हैं हरसिंगार
रह रह कर छेड़ जाती हो तुम
मेरे ह्रदय के तारों को
और झंकृत हो उठता हैं उमंग का सितार

सभी दिशाओं में
तुम्हारी ही हैं निगाह
मेरी आँखों के आईनों मे
चाहों तो तुम
कर लो खुद का दीदार

इस दुनियाँ से अलग हैं यह संसार
मिलन की आश मे
अमर हो गया हैं फ़िराक

यहाँ सिर्फ
तुम्हारे प्रति मेरे प्रेम के बीज से
वादियों में ऊग आये हैं वृक्ष विशाल
इस पार से लौटना अब मुमकिन नहीं हैं
उड़ते उड़ते लांघ आया हूँ मैं
प्यार की कल्पनाओं के क्षितिज की सीमा पर स्थित
मनोरम दीवार

पर्वत ,नदियाँ ,सागर ..बादल ..अम्बर
सभी हैं मेरे सहयोगी
कोई नहीं हैं यहाँ मेरे ख़िलाफ़
तुम हो मेरे मन का
पावन विचार

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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