मंगलवार, 18 जून 2013

647-"तुम सुषमा हो मनोहर"

"तुम सुषमा हो मनोहर"

दहक उठा हैं तुम्हारे वियोग मे
मेरी तन्हाई का सूना जंगल
तुम्हे प्रत्यक्ष देखा भी हूँ या नहीं
स्मरण नहीं हैं
आदि काल से
व्यतीत हो चुके हैं
अब तक बरस अनंत
तुम सुषमा हो मनोहर
तुम सुनहरी धूप सी
या
शीतल चांदनी सी लौट आओ
होगा जब तुम्हारा पदार्पण
करेंगे मेरे हृदय के उमंग
पुष्पों से तुम्हारा अभिनन्दन
तुम्हारे आगमन की
कर रहा हूँ चिर काल से प्रतीक्षा
यही हैं तुम्हारे प्रति
मेरे विहल प्रेम की परीक्षा
खिले खिले से लगते हैं सरोवर मे
प्रणय पंकज
फिर भी खोया नहीं हैं मेरा मन संयम
दहक उठा हैं तुम्हारे वियोग मे
मेरी तन्हाई का सूना जंगल
किशोर

646-अज़ल से क़ियामत तक

अज़ल से क़ियामत तक
क़ियामत से इब्दिता तक
इश्क़े हकीकी हैं
या
इश्के मजाज़ी हैं
इसलिए
यह दुनियाँ हुश्नआराई हैं ..

किशोर

{अज़ल =अनादी कल से ,क़ियामत =प्रलय ,इब्दिता=आरम्भ
इश्क़े हकीकी =इश्वर भक्ति ,इश्के मजाज़ी=मानवीय प्रेम
हुश्नआराई=सुन्दर होना }

645-"प्रतीक"

"प्रतीक"
नदी के किनारे की रेतीली स्लेट पर
अब भी तुम्हारे मन के लहरों की उंगलियाँ
कुछ लिख रही होंगी
हिचकोले खाते तिनकों से
तुम कह रही होगी
रुक जाओ पढ़ तो लो
मंदिर की सीढियों की झिलमिलाती परछाईयाँ
तुम्हारे और करीब आ गयी होंगी
धूल धूसरित पीपल की पत्तियाँ
कहती होंगी मेरी हथेली पर भी
रच दो प्रेम का अनूठा रंग
तुम्हे छूकर लौटती हुई सी पगडंडी पर
दूर तक कोई नहीं होगा
सिवा मौन के ..खामोशी के ..
और मेरे पदचिन्हों के ..
तुमसे बिछड़ने और फिर मिलने के मध्य का
यह दर्द से परिपूर्ण अंतराल
ही तो हम दोनों के जीवित होने का प्रतीक हैं
किशोर

644-प्यार मे .......

प्यार मे .......

तुम्हारी और मेरी कलम की स्याही
तुम्हारी नर्म और मेरी सख्त उंगलियाँ
तुम्हारे स्नेह और मेरे प्रेम से युक्त शब्द
तुम्हारी गंभीर और मेरे शोख से वाक्य
तुम्हारे पूर्ण विराम और मेरे अर्ध विराम
सभी ...आपस में मिलना चाहते हैं
तुम्हारे अव्यक्त और मेरे अभिव्यक्त विचार
आपस मे सहमत होना चाहते हैं
तुम्हारी दिव्य आत्मा और मेरी रूह
क्षितिज की सीमा रेखा के उस पार
सघन वन मे ......
सागौन के वृक्षों की परछाईयों की तरह ...
विभिन्न मुद्राओं मे नृत्य करना चाहते हैं
नभ को स्पर्श करती हुई सी ...
साल के दरख्तों की उंचाईयों को
अपनी आँखों से छूना चाहते हैं
हम दोनों एक लम्बी राह के व्यापक सूनेपन मे
गुम हो जाना चाहते हैं
किसी कन्दरा के अन्धेरें के भीतर
सदियों पूर्व से उपस्थित रोशनी के
इन्द्रधनुषी आँचल को ओढ़ लेना कहते हैं
जामुन के पेड़ पर स्थित
एक आशियाने मे चिड़ियों की तरह फुदकना चाहते हैं
समय की नदी की पहली लहर के द्वारा
रेत पर अंकित की गयी
लहराती सी प्रथम अमिट वक्र रेखा पर
सवा आखर तुम ..सवा आखर मैं
लिखना चाहते हैं ..
क्या तुम ...और मैं ...?
सचमुच ऐसा चाहते हैं ...
प्यार मे तो ..ऐसा ही होता हैं ना
किशोर कुमार खोरेन्द्र

643-मुख़्तसर सी बात हैं

मुख़्तसर सी बात हैं

तुम्हारे रूह की परछाई
और मेरे रूह का साया ...दोनों हैं संग
अब न इश्क की कोई सीमा हैं
न प्रेम मे कोई प्रतिबन्ध
न कोई शर्त हैं न कोई अनुबंध
न सतरंगी माया हैं
न काया की तरुणाई का कोई प्रलोभन
बस बजाअत हैं।।।।
और दूर दूर तक हैं उसकी बजाहत
मुख़्तसर सी बात हैं ....
रुखसत नहीं होंगे कभी हम
किशोर

बजाअत =पवित्रता ,बजाहत =प्रसार ,मुख़्तसर =सार रूप मे

642-हरीयाली का गीत"

हरीयाली का गीत"

आषाढ़ की बूंदों से
नम हुए धरती के ओर छोर
लिखने आयी हरीयाली का गीत
हर आँगन मे ,खेतों मे ,वन मे
मेघों को पार कर सुनहरी किरणों की नोक
नव अंकुरित पौधों को लग नहीं रहा
नर्म पत्तियाँ अपने सिर का बोझ
भींगे पंख को कुरेद रहे हैं
नन्हीं चिड़ियों के चोंच
अब खाली खाली रह गयी हैं सुराहियाँ
वैवाहिक मटके और मटकियाँ ..
पर हथेलियों में अब तक रचा हैं
मेहंदी का रंग शोख
झरोखों को लांघकर आ जाती हैं बौछारें
तब सिहर उठते हैं
तरुणाई की देह के रोम रोम
धुली धुली सी लगती हैं सड़कें
इंतज़ार में ठहरे से लगते हैं प्रत्येक मोड़
ठंडी हवा का झोंका बालों को सहला जाता हैं
माटी की सोंधी सोंधी खुश्बू फैली हैं चारों ओर
इस दुनियाँ रूपी बबूल के काँटों के बीच उलझ न जाए
ऐ शाम ..कही तेरा पवित्र आँचल
तुमसे यही कह रहे हैं पंछी कर शोर
आषाढ़ की बूंदों से
नम हुए धरती के ओर छोर
किशोर
 

मंगलवार, 4 जून 2013

641-"एक प्रशन ..अनुत्तरित"

"एक प्रशन ..अनुत्तरित"

प्रेम से भरे

मेरे सरस इन शब्दों कों

तुम कर लेना अपने ह्रदय में अंकित

मेरी कविताओं के बिखरे पन्नों से

एक किताब बना लेना

कर उन्हें संकलित

जब भी तुम्हें मेरी याद आये

पढ़ लिया करना

प्रत्येक अक्षर हैं

इसके बूंद बूंद अमृत

सा एकत्रित

आरम्भ में जरूर हुआ था मैं

तुम्हारे बाह्य रूप पर मोहित

सिर्फ इसलिए

मेरी अवहेलना कर

कर ने देना मेरी भावनाओं कों

अपने प्यार से तुम वंचित

कभी सौन्दर्य तुम्हारा

सुनहरी रश्मियों सा

मुझ सागर में बरसा हैं

कभी मेरी प्यासी लहरों का मन

तुम्हें चाँद समझ कर

छूने कों तरसा हैं

पर तुम तटस्थ रहकर

अपनी ख़ामोशी से

कर गयी हो मुझे व्यथित

इस दुनियाँ की तरह ही

तुम भी रही प्रिये

एक प्रशन ..अनुत्तरित

और कोई नहीं

जिसके प्रति मैं

हो पाउँगा इतना आकर्षित

गीत तुम्हारे गाता

लौट रहा मैं एक पथिक

प्रेम से भरे

मेरे सरस इन शब्दों कों

तुम कर लेना अपने ह्रदय में अंकित

किशोर

640-" साल के ऊँचे पेड़ हैं घने"

" साल के ऊँचे पेड़ हैं घने"


हर तरफ साल के ऊँचे पेड़ हैं घने
सागौन के वृक्ष नृत्य की मुद्राओं मे किनारे पर
सर उठाये ..हैं ..खड़े
दूर पर्वत की चोटी पर स्थित मंदिर मे
रंगीन ध्वजाएँ हैं फहरे
सूनी सड़क पर मील के पत्थर
स्वागत मे ..सर झुकाए ..शर्म से हैं गड़े
जाते हुए पतझड़ के मौसम की तरह
कुछ पीले पत्तें डालियों पर
न टूटने की आश लिए अब भी हैं अटके
जमीन पर क्षत विक्षत पर्णों की नसों मे
अतीत के स्मरण धूल से हैं सने
छनकर आती हुई रश्मियों के धागे
लगते हैं मानों ......
नीम की छाया के जिस्म पर
वे परिधान हो सुनहरे
वन के सीने को चीर कर बहती हुई सदियों पुरानी नदी ...
बालुओं की नर्म हथेली पर
खामोशी की एक नज्म ..अब लगी हैं लिखने
पुल पर से गुज़रती हुई शीतल हवा
मुझसे कहती हैं -
जिस पर से आज तक कोई न गुजरा हो ...
आओ ...अरण्य की उसी तन्हा पगडंडी पर ..
मैं ..और ..तुम ..चले
ऊपर नीले आसमान मे विचरण करते हुए बादल
नीचे धरती पर कानन का हरा भरा आँगन
न कोई प्रश्न ..न कोई उत्तर
आओ ...निष्काम हो निर्झर सा सतत बहे
नि:शब्द ,नि:स्वर ,निर्जन
इस महा एकांत मे
मेरा स्पंदन लगा हैं ..एकाग्रचित्त हो ..मुझे सुनने
हर तरफ साल के ऊँचे पेड़ हैं घने
kishor

639-मैं करता हूँ तुम्हारा सम्मान "

मैं करता हूँ तुम्हारा सम्मान "
 

न तुम्हारी तहरीर हैं मेरे पास
न तुम्हारी तस्वीर का मिलना हैं
मेरे लिए आसान
फिर भी मेरा नहीं हो तुम अनुमान
मैं एक अंतहीन प्रेम कहानी हूँ
जिसका तुम हो उनवान
मैं करता हूँ तुम्हारा सम्मान
पढ़कर तुम्हारे मन के भावों को
शब्दों के जरिये अक्षरस: करता हूँ अनुवाद
उड़ती हुई नजरों से फेर लेते हो मुझे
स्वीकारता हूँ इसे भी मैं ..
तुम्हारा मुझपर एहसान
तुम कल्पनातीत हो
इसलिए तुम अदृश्य हो या सदृश्य हो
इस बात का मुझे नहीं हैं भान
तुम्हे लिख लेने का तब भी
मुझे नहीं हैं अभिमान
मैं यदि शाश्वत प्रश्न हूँ ..
तो तुम हो उसका सम्पूर्ण समाधान
तुम्हारे ख्यालों मे खोया रहता हूँ
इसलिए तन्हा रहने पर भी
नहीं लगता मुझे
यह विशाल अन्तरिक्ष वीरान
तुम्हारी याद आते ही
मुझे यह होता हैं आभास
की
मेरे ह्रदय की झील मे
जगमगाते सितारों से भरा ...
उतर आया हैं वृहत आकाश
वियोग में निरंतर संयोग की आश
यही हैं मेरा स्वाभिमान
न तुम्हारी तहरीर हैं मेरे पास
न तुम्हारी तस्वीर का मिलना हैं
मेरे लिए आसान
फिर भी मेरा नहीं हो तुम अनुमान
*किशोर कुमार खोरेन्द्र

638-"तुम हो "

"तुम हो "

तुम हो मेरे मन का
पावन विचार
इसीलिए
यह कायनात लगता नहीं मुझे वीरान
जल उठे हैं
तुम्हारी खूबसूरती के अनंत चिराग
सांसों में हैं खुश्बू ए निगार

यादों के उपवन मे
खिल आये हैं हरसिंगार
रह रह कर छेड़ जाती हो तुम
मेरे ह्रदय के तारों को
और झंकृत हो उठता हैं उमंग का सितार

सभी दिशाओं में
तुम्हारी ही हैं निगाह
मेरी आँखों के आईनों मे
चाहों तो तुम
कर लो खुद का दीदार

इस दुनियाँ से अलग हैं यह संसार
मिलन की आश मे
अमर हो गया हैं फ़िराक

यहाँ सिर्फ
तुम्हारे प्रति मेरे प्रेम के बीज से
वादियों में ऊग आये हैं वृक्ष विशाल
इस पार से लौटना अब मुमकिन नहीं हैं
उड़ते उड़ते लांघ आया हूँ मैं
प्यार की कल्पनाओं के क्षितिज की सीमा पर स्थित
मनोरम दीवार

पर्वत ,नदियाँ ,सागर ..बादल ..अम्बर
सभी हैं मेरे सहयोगी
कोई नहीं हैं यहाँ मेरे ख़िलाफ़
तुम हो मेरे मन का
पावन विचार

किशोर कुमार खोरेन्द्र