शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

634-मेरे दोस्त ...






मेरे दोस्त ...
समझो मुझे
कि-
मैं हूँ एक किताब

मुझे
इस तरह
लेकिन पढ़ना
मुझमे लिखी कहानी
चलती रहे
अंतिम पन्ना कभी न आ पाए
इस बात का अपने
मन के ख्यालों में रखना हिसाब 


कुछ पृष्ठ मुड़े होंगे
उन्हें ठीक कर दिया करना
कुछ पत्ते
कोरे मिल जाया करेंगे
उनमें लिख दिया करना
अपने विचार

आखिर तक मैं
रहूंगा तुम्हारे लिए
एक किस्सा
मेरी कहानियों को
बना न लेना कभी
अपने अहसासों का
कोई हिस्सा
मैं विसाल नहीं
तुम्हारी जिंदगी में मैं हूँ फ़िराक

मेरे जीवन का तम भी उसमे होगा
कही कही पर
जलता हुआ मिलेगा तुम्हे चिराग़
तटस्थ रहना
न मेरे साथ होना
न हो जाना कभी मेरे खिलाफ

{किशोर }
विसाल =मिलन
फिराक =विरह

कोई टिप्पणी नहीं: