शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

630-"तुम हो मेरे प्रियतम "


"तुम हो मेरे प्रियतम "

काँटों की लिए चुभन
आशाओं के उपवन में
खिलते है सुमन



जल बूंदों से भरे होते हैं
नभ में उड़ते हुए बादल
रेगिस्तान सा लगता हैं
फिर भी प्यासा यह जीवन

कहते हैं -बोध तभी संभव है
जब खुद से खुद का हो मिलन
क्या प्रेम का अर्थ यही है की
मै करती रहूँ सिर्फ़ तुम्हारा चिंतन

तुममे और मुझमे कोई भेद नहीं हैं
मैं तुम्हारी प्रियतमा हूँ और
तुम हो मेरे प्रियतम

किशोर

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