शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

629-"जैसे तुम.."


"जैसे तुम.."

जैसे तुम
सुबह की हो पहली सुनहरी किरण
कभी बह आती हो बन बयार शीतल
खिले फूलों मे
स्नेह के गाड़े रंग सी आती हो उभर
सड़कों के किनारे झुके से खड़े


वृक्षों की टहनियों सी मुझे छूकर
उमंग जगाती हो मेरे भीतर
कभी लगता हैं आकाश में ठहरे हुए
अंतिम तारे की तरह
मेरे जागने का
इंतज़ार कर रही हो होकर विकल
धूप की तरह अब सीढियों से उतर आओ
तुम्हारे स्वागत में
जमीन की तरह बिछा हुआ है मेरा जीवन
तुम बादल के एक टुकड़े की तरह टहलते हुए धीरे धीरे
और करीब आ जाओ
तुम्हे पाने की चाह में मैं भी तो
बन गया हूँ ऊँचे पर्वत का एक शिखर
तुम्हारी ख़ामोशी से मेरी ख़ामोशी का
तभी तो होगा दिव्य मिलन
किशोर कुमार खोरेन्द्र

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