शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

628-"तुम्हे देखे बिन"


"तुम्हे देखे बिन"

तुम्हे देखे बिन
मैं किया करता हूँ
तुम्हारी खूबसूरती की तारीफ
मुझे तो लगता हैं
तुम्हारा सौन्दर्य होगा इसी काबिल

चाहो तो तुम मुझे
अपने सपनों में कर लिया करो आमंत्रित
तुम्हारे एक इशारे पर
मैं लाँघ आउंगा ऊँचे ऊँचे पर्वतों की सख्त पीठ
चाहे कितना भी गहरा होगा सागर
या
कितनी भी गहरी होगी झील

तुम्हारी अजनबी सी आँखों मे अपने खातिर
मैंने पाया हैं जहाँ पर अपरिमित सा क्षितिज
मैं आकाश के बादलों सा वहाँ पर ..
तुममे सुन्दर आकार लिए जाउंगा घुलमिल
कभी लगता हैं मुझे तुम्हारे प्रति
मेरा प्रेम एक तरफ़ा हैं
कम से कम इस जनम मे तो
तुम्हारे ह्रदय मे मेरे लिए जगह है या नहीं
चाहता हूँ कर लूँ
यह महत्वपूर्ण जानकारी हासिल

तुम्हारा कोई नाम तो होगा
तुम्हारा कोई पता तो होगा
तुम्हारा अस्तित्व होगा ही
बार बार यह क्यों कहता हैं
मुझसे मेरा एकाकी दिल

तुम्हें याद कर जिस तरह
मेरी आँखों मे आंसूं आ जाते हैं
क्या मुझे स्मरण कर
तुम्हारी पलकें भी हो जाती है अश्रुपूरित
तुम्हे राधा कहूँ या मीरा
मेरी कल्पनाओं मै
तुम इसी तरह से हो शामिल

मन मे समाये अथाह प्यार को
तुम्हारे समक्ष ही


करना चाहता हूँ मैं जाहिर
इस जग मे चाहकर भी
कोई किसी का न हो पाया
वीरान जंगल की सूनी राह की तरह
क्या मेरी भी कोई नहीं है मंजिल

अपने स्नेह के अमृत को
किसे करूँ समरपित
सामने यदि तुम प्रगट हो जाओ
तो मुझ भटके हुए लहर को
मिल जाएगा साहिल

तुम्हे देखे बिन
मैं किया करता हूँ
तुम्हारी खूबसूरती की तारीफ
मुझे तो लगता हैं
तुम्हारा सौन्दर्य होगा इसी काबिल

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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