रविवार, 24 फ़रवरी 2013

618-"पृथ्वी की गोद मे "

"पृथ्वी की गोद मे "

तट पर स्थिर पड़े हुए
कछुवे की तरह
ठहरा हुआ लग रहा था
मुझे
सुबह का शांत वक्त

केवल फेनिल लहरों के शोर कों
सुन रहें थे
पास ही की सडको और मकानों तक
जाती हुई
सूनी पगडण्डीयों के दृश्य 



कुछ जाते हुए अन्धेरें और आ रहें
सम्पूर्ण उजाले में
डूबी हुई थी कुछ झोपड़ियां ....
धीरे धीरे क्रमश:..
आसमान की तरह साफ़ साफ़
फिर नजर आने लगे थे
अंकित हो चुकी अनगिनत पद चिन्हों के सदृश्य .....
रौंधी हुई रेत के सीने पर
उभर आये जख्म .........

जालों से लदी हुई नावें
जा चुकी थी
न मछलियों कों पता था
न मंझधार कों
कि-
क्या होगा आज शाम तक उनका हश्र

खाली शीशी की परछाई
अब भी पूर्व की भांति
स्याह रंग से
भरी हुई थी...
यह देख कर भरा भरा
समुद्र भी था स्तब्ध

बिना ह्रदय के
केवल सिर लिये सा एक श्रीफल
अपनी आँखे मूंदें
माथे पर तिलक लगाए
तपस्वी सा लग रहा था
ध्यान मग्न

कुछ पालीथीन के दिल ...चीरे हुए थे
कुछ पन्नों की देहें .. फटी हुई ..
बिखरे हुए थे
कुछ चप्पलें .अपनो से बिछड़ कर .....छूटी हुई थी
कुछ घरौंधों की दीवारे हो चुकी थी ध्वस्त

लौटते हुई मौज के संग
मेरे पांवों के नीचे से
जमीन खिसक रही थी
परन्तु
इठलाता
हिचकोले खाता महासागर ..........!
पृथ्वी की गोद में ..
अबोध शिशु सा था अपनी धुन में मस्त

किशोर

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