रविवार, 24 फ़रवरी 2013

612-यह जीस्त हैं या ..

यह जीस्त हैं या ..
हैं तश्नगी
कहते हैं हर बूंद में सागर हैं
लेकिन खुद की
कैसे करूँ मैं बंदगी
डोर किसी और के हाथ मे हैं
पतंग सा उड़ रहा हूँ ..
क्या यही हैं ..जिन्दगी
मुझे देखकर किसी की निगाहों मे
आ गयी हैं ख़ुशी से नमी
फिर भी कहता हूँ उसे मैं अजनबी
मेरे ख्वाब उसके सपनों में जाकर
करते हैं चहल कदमी 


घेर लेती हैं मुझे कभी
उसकी रूह की रोशनी सतरंगी
और
कभी आत्मसात कर लेती हैं मुझे
मेरी तन्हाई की तीरगी
यह जीस्त हैं या ..
हैं तश्नगी
किशोर कुमार खोरेन्द्र

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