शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

611-इंतज़ार में मौन


इंतज़ार में मौन

इंतज़ार में मौन
तडफता हैं

कभी नसों में चीटीयाँ
रेंगती सी लगती हैं

घास के तिनके भी
काटों की तरह चूभ जाते हैं

वृक्ष की सूखी हुई छालों की तरह
दर्द का अहसास
हथेलियों पर आप से आप गिर आता हैं

झुकी हुई टहनिया छोड़ कर मेरी
उंगलिया ...मुझे चिडाती हुई
लचकती हुई
ऊपर ऊठ जाती हैं

धूप की चमक आँखों के सामने अंधेरा
बिखेर जाती हैं

सब कुछ दोपहर की तरह सूना सूना
सा लगने लगता हैं

मैं पत्थर के एक गोल टुकड़े की तरह
सरोवर के जल की सतह पर
जोरों से वक्त के हाथों उछला हुआ सा
फिसलता ..दौड़ता हुआ सा
खुद कों महसूस करता हूँ

चिड़ियों की तरह छाँव के संग फिर
चुपचाप दुबक कर..बैठ जाता हूँ

किशोर

3 टिप्‍पणियां:

sushma 'आहुति' ने कहा…

गहन अभिवयक्ति......

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

बहुत भावपूर्ण रचना, शुभकामनाएँ.

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

thank u sushma ji ,thank u jenny sis