मंगलवार, 1 जनवरी 2013

तुमसे गुजारिश हैं

तुमसे गुजारिश हैं


अब कतरे में सागर नहीं
सहरा हैं
जब से कोई फ़िराक
मेरे मन में आकर
ठहरा हैं
न हुश्न का चाँद हैं
न इश्क की चांदनी हैं
जमीं से आसमां तक
ऐ आलम ..
अमावश कितना गहरा हैं
बेगानों की तरह तुम
मुझसे ..इतनी दूर पर खडी होती हो
और ..
तुम्हारे साये पर भी पहरा हैं
ऐ शोख नदी ..
तुमसे गुजारिश हैं
फिर से लौट आओं
मुझे तो पर्वत से सागर तक
तुम्हारे संग बहना हैं
सहर होने से पहले
रोशनी की एक किरण तो दिखे
अनजान राहों पर मुझे
पुन:
तुम्हारे संग चलना हैं

किशोर