गुरुवार, 24 जनवरी 2013

607-ओस के दाने ........



ओस के दाने ........

खेतों में
उगे हैं मोती की तरह
ओस के दाने

गौरया के पंख फंस न जाएँ
इसलिए बबूल के नुकीले कांटे
लगे हैं उन चिड़ियों कों बचाने

दो मैना
टहल रही हैं चुपचाप
प्यार करने का यह नायाब तरीका
जल्दी आना हमें सीखाने

थकी हुई धूप कह रही हैं
संध्या से
अपने लिये तम का बिस्तर बिछाने
प्रकृति की सूनी कलाई में

 

पलाश आ निकला हैं
केशरिया ..चूड़ियां पहनाने
किशोर

4 टिप्‍पणियां:

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

उम्दा प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत बधाई...६४वें गणतंत्र दिवस पर शुभकामनाएं...

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

बहुत खूबसूरत कविता, शुभकामनाएँ.

mridula pradhan ने कहा…

khoobsurat kavita.....

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

prasnn ji ,jenny ji ,mridula ji ..shukriya