गुरुवार, 3 जनवरी 2013

601-"तुम्हारे प्रेम के जरिये"




"तुम्हारे प्रेम के जरिये"


मैं बूंद हूँ तो तुम हो मेरे लिए सागर
तुम सोंधी सोंधी माटी हो
तो उससे बना हुआ हूँ मैं एक गागर
मैं जागता हूँ तब
मेरे ख्यालों में अप्सरा सी ..
तुम्ही खड़ी हो जाती हो आकर

मैं जब सोता हूँ
खुश रहता हूँ सपनो में तुम्हे पाकर
ध्यान में तुम्हारा ही नाम जपता हूँ
दिब्य ज्योति सी तुम्ही मुझे
शीतल कर जाती हो
मेरी आँखों में ज्योत्सना सी छाकर

मेरे निराकार भावों को तुम
कर जाती हो साकार
मुझ शून्य के मन का
तुम हो मनोवांछित आकार
मुझ मौन को मुखरित कर जाती हो
देकर अपनी मधुर आवाज
राह सा भटकना चाहूँ ...
तो धरती बन जाती हो
उड़ना चाहूँ तो बन जाती हो
मेरे लिए तुम आकाश

मेरा तन ,मेरा मन ,मेरी अंतरात्मा
जिस पर आधारित हैं
तुम हो मेरा
वही.. परम आधार
तुम्हारे प्रेम के जरिये
परमात्मा से मिलन
मुझ आत्मा का
हुआ हैं ....
प्रिये ..!इसी प्रकार

किशोर कुमार

2 टिप्‍पणियां:

sushma 'आहुति' ने कहा…

बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

ha yah sty par aadhaarit kavita hai ..aapko pasand aayi ..bahut dhnyvaad