गुरुवार, 24 जनवरी 2013

607-ओस के दाने ........



ओस के दाने ........

खेतों में
उगे हैं मोती की तरह
ओस के दाने

गौरया के पंख फंस न जाएँ
इसलिए बबूल के नुकीले कांटे
लगे हैं उन चिड़ियों कों बचाने

दो मैना
टहल रही हैं चुपचाप
प्यार करने का यह नायाब तरीका
जल्दी आना हमें सीखाने

थकी हुई धूप कह रही हैं
संध्या से
अपने लिये तम का बिस्तर बिछाने
प्रकृति की सूनी कलाई में

 

पलाश आ निकला हैं
केशरिया ..चूड़ियां पहनाने
किशोर

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

606-मै हूँ एक पथिक ......

मै हूँ एक पथिक ......


मै हूँ एक पथिक
निकल आया हूँ बहुत दूर
कभी किसी गाँव ने ठहराया
छाँव दे गयी कभी अमराई

नदियों ने कहा
प्यास बुझाकर
निहार लो अपनी परछाई

खेतों में खड़े वृक्षों की शाखों ने
अपनी पत्तियों कों हिलाकर
हर मोड़ पर मुझे दी है बिदाई

पंछियों ने आगे तक उड़कर
मुझे दुर्गम राह है बतायी

कभी घने जंगल से
हाथ पकड़ कर
शहर तक ले गयी मुझे पुरवाई

पर भीड़ में भी
मैं अकेला ही रहा
अपने ही मन और तन की
इच्छाओं से बेखबर
यही हैं सच्चाई

सोने के लिये
फुटपात पर
अपनी चटाई बिछाई
सितारों से जगमगाते आकाश ने
मुझ पर अपनी रोशनी लुटाई

समुद्र के किनारे लहरों ने कहा
छोड़ जाओ यही
झाग की तरह ....
अपने अहंकार के बिखरे हुए टुकड़ों कों
बूंद से बूंद आपस में जैसे हैं मिले
वैसे ही सरल ,तरल होने से ही
चेतना जान पाती है
अपने भीतर की सच्ची गहराई

किशोर

605-अपनी अंतरात्मा में रहों...

अपनी अंतरात्मा में रहों...
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kishorkumarkhorendra द्वारा 8 फ़रवरी, 2011 3:07:00 PM IST पर पोस्टेड #



सड़कों से कहता रहा
अगर संकीर्ण पुल या
करीब खाई हो
तो ऐसे बचो

धूल से कहा -
अपने रंग कों ..
इस तरह न आईने के चेहेरे पर मलो

पगडंडीयों पर बिछे हैं
असंख्य कांटें और मुरुम
वे कहते हैं ..मुझसे ..
मंजिल कों पाना हैं तो हम पर चलों

मोड़ ने कहा -
रुढियों के हाथों लिखे अक्षरों कों
मत पढों

चाहते हो यदि परिवर्तन तो
युद्ध करों

दूर से दृष्टी में
सब कुछ एक समान ...
एकरस समाया

क्या सत्य ...क्या माया
एक चेतना में सब हैं स्थित
यही मुझे समझ में आया

फिर स्वयं के विषय में ..
जब भी यह सोचा कि
क्या ..मैं अकेला हूँ....

सपना बनकर
किसी एक और व्यक्ति ने
मेरे ही प्रतिरूप की भावनाओं सा
मेरा साथ निभाया

कभी वह मेरे साथ चलती हैं
बन कर मेरी छाया
कभी मुझसे बाते करती हैं
मेरे दूसरे मन का
जैसे हो वह .. काल्पनिक साया
तब एक दिन नदी ने कहा
मेरे संग नहीं
अपने भीतर बहों

पर्वत और उसकी गुफाओं ने कहा
अपनी अंतरात्मा में रहों

किशोर

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

अच्छा व्यक्ति


 अच्छा व्यक्ति



अच्छा व्यक्ति होने के लिए
यही है एक शर्त
महसूस करे दूसरों का भी दर्द
किशोर

"603-साक्षी हैं इतिहास"



"साक्षी हैं इतिहास"

साक्षी हैं इतिहास
पाकर मां का आशीर्वाद
अवतरित हुए
धरती पर भगवान्
उस नारी का कर अपमान
किस तरह से
सुसंस्कृत हो पायेगा इंसान

अब तक चुप रहकर
देते आये सुधरने का
असंयम को अवसर
जागरूक हो चुकी है महिलायें
अब न सहेंगी वे
सदियों से होते आये
इस तरह के अपराध

तजना होगा आज के परिवेश में
छेड़ छाड़ ,छींटाकसी ,यौन उत्पीडन
दहेज प्रथा ,भ्रूण हत्या और बलात्कार
करना होगा नारी प्रताड़ना से जुडी
हर घटना पर दंड का
सख्त से सख्त प्रावधान

नारी देवी का हैं रूप
ममता की हैं मूरत
श्रद्धा की हैं वह पात्र
नारी के कारण ही पुरुष का
अस्तित्व हैं विद्यमान

सहनशीलता का यह अर्थ नहीं की
भविष्य में भी हो
उन पर होता रहे घोर अत्याचार
पुरुषों पहचानों भारत माता को
अब न हो
इस पावन धरती पर
ऐसे निंदनीय हालात

निस्वार्थ प्रेम की बाती सी जो
प्रज्वलित रहती हैं आजीवन
उसी के कारण सूर्य में है प्रकाश
पाकर मां का आशीर्वाद
अवतरित हुए
धरती पर भगवान्
साक्षी हैं इतिहास


किशोर कुमार खोरेन्द्र

602-उसकी आँखों का तारा हूँ मैं

उसकी आँखों का तारा हूँ मैं


इस आशा से
रोज लौटता हूँ स्कूल से घर
मेरी माँ कर देगी
मेरे सारे कठिन प्रशनों को हल
मेरी माँ का ह्रदय
फिर भी बहुत हैं सरल
मेरा रखती हैं ख्याल वह हर पल
खेल खेल में चोट मुझे लगती हैं
तो उसके चेहरे पर
दर्द आता हैं उभर
मै अक्सर
झूठ मुठ रोता इसीलिए हूँ
ताकि मेरे आंसूओं को मेरी आँखों से
हटाये उसका नरम आँचल
उसकी आँखों का तारा हूँ मैं
चाहती हैं मैं उसकी नजरों से
कभी न होऊं ओझल

किशोर कुमार

601-"तुम्हारे प्रेम के जरिये"




"तुम्हारे प्रेम के जरिये"


मैं बूंद हूँ तो तुम हो मेरे लिए सागर
तुम सोंधी सोंधी माटी हो
तो उससे बना हुआ हूँ मैं एक गागर
मैं जागता हूँ तब
मेरे ख्यालों में अप्सरा सी ..
तुम्ही खड़ी हो जाती हो आकर

मैं जब सोता हूँ
खुश रहता हूँ सपनो में तुम्हे पाकर
ध्यान में तुम्हारा ही नाम जपता हूँ
दिब्य ज्योति सी तुम्ही मुझे
शीतल कर जाती हो
मेरी आँखों में ज्योत्सना सी छाकर

मेरे निराकार भावों को तुम
कर जाती हो साकार
मुझ शून्य के मन का
तुम हो मनोवांछित आकार
मुझ मौन को मुखरित कर जाती हो
देकर अपनी मधुर आवाज
राह सा भटकना चाहूँ ...
तो धरती बन जाती हो
उड़ना चाहूँ तो बन जाती हो
मेरे लिए तुम आकाश

मेरा तन ,मेरा मन ,मेरी अंतरात्मा
जिस पर आधारित हैं
तुम हो मेरा
वही.. परम आधार
तुम्हारे प्रेम के जरिये
परमात्मा से मिलन
मुझ आत्मा का
हुआ हैं ....
प्रिये ..!इसी प्रकार

किशोर कुमार