सोमवार, 31 दिसंबर 2012

लिखते लिखते ...

561-लिखते लिखते ...

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 11, 2012 at 5:46pm ·
लिखते लिखते ...

लिखते लिखते ...
कहानी ..कभी कविता बन जाती है
और
कभी कविता मे ...कहानी आ जाती है

जैसे सपने ...कभी सच हो जाते है
और
कभी सच ...सपने बन जाते है

लेकीन तुम ..
कविता भी हो ...कहानी भी
तुम सच भी हो ..और सपना भी

तुम मेरी कल्पना के करीब हो
इसलीये सच हो

लेकीन न मै तुम्हारा नाम जानता हू
न पता
बहुत दूर आकाश मे
बादलो से है शायद तुम्हारा घर बना


जैसे अजनबी जिन्दगी ने
मुझे समझ रखा है
अपनी ही तरह ...
इस दुनियाँ मे लापता

इसलीये तुम सपना भी हो

कैसे बताऊ कि -
मेरे मन ने ..किसी पौधे से
फूल की तरह ...
तुम्हारी आत्मा के शरीर से
माँगा है -तुम्हारा एक् सुन्दर चेहरा

ममता ,स्नेह ,प्रेम से भरा
अब ....
मेरे पास जीने के लिये
शब्दों के
जालो से भरी -
एक् नदी है
जिसमे मैं तुम्हारे बिना
एक् तड़फती हुई मछली सा
गठानों से हूँ घिरा


किशोर कुमार खोरेंद्र

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