सोमवार, 31 दिसंबर 2012

निर्निमेष निहारते है

565-निर्निमेष निहारते है

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 11, 2012 at 5:56pm ·
निर्निमेष निहारते है
kishorkumarkhorendra द्वारा 18 नवंबर, 2009 7:27:00 PM IST पर पोस्टेड #




पेड़ की ओट ..
हो जाता हू
तब भी देख लेता है
मुझे सूर्य का अरुण

मुझे ढूंढ़ लेती है
सिंदूरी किरणे हो ब्याकूल

अज्ञात की उंगलियों सा -
छू लेते है
झुकी हुई टहनियों के
सुकोमल नाखून

अपने आँचल में छिपाकर
संध्या ...
रख आती है
मन्दिर के द्वार मुझे अबूझ

न निगल पाता है मुझे तिमिर
न बुझा पाते है
समीर के बदलते रुख

निर्निमेष निहारते है
मुझे
आकाश के अनंत
चमकते प्रसून

संसार की नीरवता
सुनती है तब ....
मेरी लयबद्ध धडकनों को -
अपने अनुकूल ...

किशोर
 

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