सोमवार, 31 दिसंबर 2012

काँच का मनुष्य

554-काँच का मनुष्य

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 11, 2012 at 5:30pm ·



kishorkumarkhorendra द्वारा 27 दिसंबर, 2009 11:10:00 AM IST पर पोस्टेड #

तुम मुझे
अपने आंसुओं के पवित्र जल से रोज नहलाती हो
तुम मुझे
हिरदय के अपने स्व्क्छ रूमाल से
साफ़ करती हो

मेरे लिए यही
प्राथना करती हो
हे प्रभू
इसे टूटने मत देना

फिर दुनिया के स्वागत कक्ष मे रख देती हो

यह कहते हुए
कि
जब लोग आये
तब
अपने दिल के आईने मे
रखी मेरी तस्वीर मत दिखा देना

मुझसे अनजान बने रहना
मुझे देखना मत
मेरे करीब मत आना
मेरा नाम मत पुकारना

लेकीन मै तो
आर -पार दिखाई देने वाला
कांच का मनुष्य हूँ

उसके आंसू
मेरी आँखों की दुनियाँ मे सुरक्षित है
उसके स्पर्श के हाथो की कोमलता
मुझसे
देह की तरह चिपकी हुई है

उसकी शाश्वत कामना है -
मै साबूत रहूँ

और वह
मेरे पारदर्शी शीशे की
अटूट आत्मा के दर्पण मे
अपनी विभिन्न परछाईयों कों
निहारती रहें -मुक्त और स्वतंत्र समझ

पर मै
नाजूक कांच का मनुष्य
उसके प्यार और सौन्दर्य की
आंच से
कभी भी
टूट कर बिखर सकता हू

और स्वागत कक्ष मे
उपस्थित निगाहों कों ...
अपने प्रेम से घायल
व्यक्तित्व के प्रखर टुकडो से -
चूभ सकता हूँ

किशोर

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