सोमवार, 31 दिसंबर 2012

मै तुम्हारा मन हूँ "

549-"मै तुम्हारा मन हूँ "

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Wednesday, October 31, 2012 at 12:41pm ·

"मै तुम्हारा मन हूँ "

मै तुम्हारा मन हूँ
अनेक शब्दों के बादलो से बनाता हूँ
तुम्हारा चित्र
या
अनेक चित्रों के अक्षरों से ,रचता हूँ
तुम्हारे लिए शब्द
तुम कभी बादलो को बाहों मे भर लेती हो
या

तुम कभी मुझे एक शब्द की तरह
पुकार लेती हो
तुम्हारी पुकार के प्रतिउत्तर में
तुम तक पहुँचने की कोशिश में
शुष्क पत्तियों की तरह में बिखर जाता हूँ
सपनो से
लाख मांगने पर भी
एक भी स्वप्न अपने दायरे से बाहर
निकल कर जागरण के लिए
तुम्हे
स्वप्न का एक टुकडा नहीं लौटाता
और इस तरह
तुम्हारे पास
या
तो -बिना आकृतियों वाले शब्द रह जाते हैं
या
फ़िर -बिना शब्दों की
एक धूमिल सी आकृति रह जाती है
लेकिन क्या हम एक दूसरे के लिए
केवल शब्द है
या
शब्दों से परे धुंध से बने चित्र हैं....?

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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