सोमवार, 31 दिसंबर 2012

सुरक्षित रहे यह दुनियां

550-सुरक्षित रहे यह दुनियां

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Thursday, November 1, 2012 at 6:00pm ·

सुरक्षित रहे यह दुनियां


पगडंडियाँ जहाँ पर थक-कर
आकर ठहरती है
शुरू होती हैं

वहीं से मेरी कविता
मै एक वृक्ष की छाँव सा
पगडंडियों से पूछता हूँ
उनका दर्द
हर मोड़ के प्रति
उनका आकर्षण
उनकी धूल को किस -किस ने
माथे पर
लगा कर किया था यात्रा का शुभारम्भ
कौन चल नही पाया
क्या किसी की कामना पूरी हो गई ?
करने के पश्चात मन्दिर का दर्शन
लोगो के दुखों से द्रवित होकर
कईयों का हो गया होगा
हिरदय परिवर्तन
जब पगडंडिया
लौटती है
उस पार पहाड़ के उतरती है
मेरी पत्तियाँ टूट -टूट कर दौड़ती हुई
उनका पीछा करती है
बदले मे लौट कर आए पंछियों से
भर जाता हूँ मै
और देखता रह जाता हू
तिनको का जमाव
घोसलों से अंडो का लगाव
कई बार मुझे लगने लगता है
चिडियों की जगह मै बैठा हूँ
अंडो की देखभाल करते हुए
लेकिन
मुझसे टूट कर गिरे एक पत्ते की तरह
कभी न कभी कोई एक
नया बच्चा
घोसले से बाहर गिर ही जाता है .... मानो
मेरी हथेली से मै ही फिसल गया होऊ .....
तब
ऐसा लगता है मुझे ...मुझसे कोई अपराध हो गया हो
पता नही घोसले को पछतावा हुआ या नहीं
मगर चिडियों की तरह
मेरी भी चीख निकल जाती है एकाएक
मै कर रहा हूँ आत्म समर्पण ......
क्योकि मेरा ,हर मनुष्य का -
यह दायित्व है
की
सुरक्षित रहे यह दुनियां

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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