सोमवार, 31 दिसंबर 2012

मुझसे आकर मिल

558-मुझसे आकर मिल

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 11, 2012 at 5:39pm ·

मुझसे आकर मिल
kishorkumarkhorendra द्वारा 21 दिसंबर, 2009 9:36:00 PM IST पर पोस्टेड #


चाहता हूँ में

सारी किताबें पढ़ लूँ
या
घर आकर मुझे ...
सारी किताबें पढ़ ले

हो सकता है .....

पत्थरों से निर्मित
भव्य मन्दिर की छत की
सभी स्वर्ण ईंटें
आपस में सहमत हो

या

विशाल वृक्ष की
अनपढ़ डालियों पर
झूमती
पत्तियों की हथेलियों की
रंजिश करती ऊंगलिया
आपस में असहमत हो

या
नियमों के अटल पहाड़ हो
या

पुलों के अनुशासित विचार हो

या फिर -
मील के पत्थरों को
तन्हा छोड़ आए
चौड़ी सड़कों के ...लंबे सुखों को
आत्मसात कर लौटे
ट्रकों के पहियों सा
घिसा -पीटा वर्तमान हो

सब चलेगा .....
..डरी सहमी या सजी सन्वरी
जिंदगी से
समझौता कर
में जी लूँगा

इस सुंदर प्रकृति
और
तुमसे मिलें प्यार की खातिर

दर्द से भरे मेलों के जग में
रेत की नदियों को निचोड़ कर
मैं ..पानी पी लूँगा

लेकिन ऐ जिंदगी ...
बस यही एक शर्त है ...
हर चौराहे ,हर मोड़ पर -मुझे संग रखना

दुखों के पहाड़ हो
या
सुखों की मीठी -नमकीन झील
यात्रा के अंत तक
मुझे रखना
अपने साथ शामील

वर्ना
मेरी शर्तों पर ...
जीने के लिए

जिंदगी ....!
तू ....
मुझसे आकर मिल /


किशोर

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