सोमवार, 31 दिसंबर 2012

मुझ तट के लिए

553-मुझ तट के लिए

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 11, 2012 at 5:29pm ·
मुझ तट के लिए
kishorkumarkhorendra द्वारा 25 दिसंबर, 2009 1:37:00 PM IST पर पोस्टेड #

दर्द के समुद्र की
गर्जनाओं से बने
मौन की तरह ..
तुम चुप हो

रेत के टीलों से बने शहरों से
निर्मित ...

एक् चट्टान से सहारा लेकर
विश्राम करती हुई
मेरी रीढ़ की नसों मे
तुम ...
स्मरण की प्रवाहित
झंकृत धुन हो

युगों के विरह की
अग्नि मे तपकर
एकत्रित ईटो से बना
मेरे पदार्पण के इंतज़ार मे
अकेले खड़े .. तुम
एकांत का सुदृढ़ पुल हो

शिखर पर जमी बर्फ सा
न तुम पिघलते हो
न बहकर मेरे करीब से गुजरते हो
जल रहित अदृश्य से हो तुम
लेकीन
मुझ तट के लिए
बहती हुई नदी होने के

अहसास से परिपूर्ण हो
किशोर

कोई टिप्पणी नहीं: