शनिवार, 8 दिसंबर 2012

64-एक वृहत -सुन्दर सपन



64-एक वृहत -सुन्दर सपन

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Monday, July 4, 2011 at 9:23pm ·




नदी में तप्त रेत हो
या
रेत के ऊपर
भरा हो
चाहे शीतल
मेघ जल
समतल ....

मुझे
ले चलती हैं
बहा कर
तब .........दोनों ही अवसरों पर नदिया
झिलमिलाती धूप
तो कभी
बहती जलधारा
अपने अपने संग
 
हर व्यक्ति हैं
इस विराट ब्रम्हांड में
एक एक रज -कण
या
एक एक बूंद जल
के द्वारा .....देखे गए सा -
एक वृहत -सुन्दर सपन
 
कर रहें ग्रह नक्षत्र
सभी भ्रमण
उनसे परावर्तित हो मिलती हैं
ऊर्जा -सचेतन लेकिन
अपनी अपनी देह तक ही सिमित
बहुत बहुत व्यक्तिगत हैं
हम सबका चिंतन और मनन
 
स्वयं कों छोड़कर ..
अन्य के प्रति हमारे व्यवहार होते हैं
अति -निर्मम
इसलिए
चाँद हो या सूरज
धरती पर खिले हुए हो
चाहे अनगिनत -सुमन 

सब देखते रह जाते हैं 
आखिर दूसरों के दुःख के प्रति
तटस्थ
रहने का ..
प्राय: ......
हम सबमे कयों हैं
व्यसन
.किशोर  कुमार खोरेन्द्र 


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