गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

6-विस्तृत वन



6-विस्तृत वन

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Tuesday, November 2, 2010 at 7:31pm ·
विस्तृत वन में पथ के 
बहके हुए हैं कदम
चुपचाप बह रहे हैं 
निर्जन के क्षण
 
 झर रहे हैं मौन - शब्द
 सहित ....पीले भूरे रंग 
 वृक्ष के पत्तों के संग 
 बह रहा समीर मंद
 स्थिर लग रहे दृश्य
 ठिठकी हुई सी 
हैं परछाईयाँ सब
 
 बाहों मे धूप के 
छाया की देह भी नर्म
 आलिंगन के आंच से 
हो गयी हैं ... गर्म
 
 स्रोत का मोह त्याग 
पहाड़ से उतरकर प्रेम मे डूबी
 सागर की तरफ़ जा रही नदिया 
कह रही मुझसे
आओ पास मेरे 
यही हैं शुभ - अवसर

मेरा जल हैं स्वच्छ मीठा

पवित्र और दर्पण सा निर्मल


मुझमे डुबाकर अपना चेहरा
उतार लो  मढ़ा  मुखौटा
और सारे आडम्बर 

*किशोर कुमार खोरेन्द्र 




कोई टिप्पणी नहीं: