शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

56-तुम्हारे ध्यान में हूँ बस समाधिस्थ



56-तुम्हारे ध्यान में हूँ बस समाधिस्थ

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Thursday, June 30, 2011 at 2:38pm ·


रहने दो मुझे तुम्हारी देह से अपरिचित
मेरी आँखों में तुम्हारी तस्वीरे हैं संचित
मिलन यदि हुआ भी तो वह होगा क्षणिक
विरह में तुम्हारी स्मृति रहेगी
मेरी चेतना में कई जन्मों तक जीवित
कभी न कभी तो पहुँच  पाउँगा
तुम्हारे मन के उस कोने में  
जहाँ रहती हो तुम सुरक्षित
जब दूर जाने लगता हूँ  
कहती हो ...रहो समीप
पास रहने पर कहती हो 
"मुझे पा लेने की  करों कोशिश"
इसलिए अब मैं ...तटस्थ हूँ
तुम्हारे ध्यान में हूँ बस समाधिस्थ
किशोर कुमार खोरेन्द्र 


1 टिप्पणी:

आशा जोगळेकर ने कहा…

इसलिये अब तुम्हारे ध्यान में बस हूँ समाधिस्त ।

वाह यह प्रिया और ईश्वर के समाधी में लीन होना ।