गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

544--नदी हूँ



544--नदी हूँ
by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Monday, October 29, 2012 at 5:56pm ·



नदी हूँ
मै ...मौन

तटस्थ मन्दिर की सूनी सीढ़ियों  का
झिलमिलाता दृश्य लिए
 या
 पीपल की घनी बाहों से
झरे
पत्तो की शुष्क अधरों की प्यास लिए

मै बहती हूँ
खुद राह बनाती
तोड़ धरती की पथरीली छाती
मोड़ से हर
आगे बढ़कर
लौट कर
फिर कभी नही आती

नदी हूँ
मै ...मौन

गहराई से मेरा नाता है
सत्य की सतह का स्पर्श
जो नही कर पाता है
उसे इस
जग -जल मे
तैरना कहाँ सचमुच आता है

पारदर्शी देह के कांच में अपने
मौसम के हर परिवर्तन का
अक्श लिये

सोचती हूँ ..
कभी थाम कर
सदैव रहूँ
बादलो के जल -मग्न छोर

धरा के जीवित पाषाणों की
लुभावनी आकृतियों के आकर्षण कों
छोड़

या

वन वृक्षो की जड़ो का
मेरे लिए
मोह का दृड़ नाता तोड़ 

मै चाहती बहती रहूँ  निरंतर
क्षण क्षण
कल कल की धुन की मधुरता
अपने एकांत के वृहत रेगिस्तान मे घोल 

समय की नदी हूँ
एक ..मै मौन अनमोल 
 किशोर कुमार 

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