गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

542-तुमसे ...क्या कहा था उसने ...



542-तुमसे ...क्या कहा था उसने ...
by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Monday, October 29, 2012 at 5:39pm ·


तपती दोपहरी में ..
जड़े सोचती होंगी
टहनी के शीर्ष पर
 किसी भी हालत में
मुझे कल सुबह खिलाना हैं गुलाब

बिना चिंतन किये
कैसे बहती होगी ...नदिया की धार

अपने मौलिक ..विचारों को
जिस तरह छिपाए रखता हैं
आखिर तक इंसान

उसी तरह
जमीन से पर्वत की चोटी तक
बनी हुई सीढियों के दर्द को
कहाँ अभियक्त कर पाते हैं
मूक पाषाण

धूप में चमचमाता हुआ कांच
कब कर पाता हैं
अपनी खुशियों का इजहार

बैठ कर शमशान के समीप
कौन सुनता हैं
कब्र के उदगार

इसीलिए खामोशी से ......कहता हूँ
मुझे भी सिखला दो
इशारों से ..
अपनी गूँगी भाषा ..चुपचाप

ताकि पुकार सकूँ ...
लहरों की तरह
तुम्हें ...ऐ वक्त .....!
मत जाओ ..कोलाहल से भरा हैं शहर
मुझ वृक्ष के नीचे
कुछ देर तो जाओ ठहर
सुकून देने वाला ...मेरे मन में बसे
वृहत जंगल सा हैं ..मेरा एकांत

पूछता दर्पण से ...
मेरे बारे में ..
तुमसे ...क्या कहा था उसने
क्या उसे सचमुच ...?
मेरी आवारगी से हैं प्यार
किशोर कुमार 

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