रविवार, 23 दिसंबर 2012

531-"सैकड़ों परछाईयों के बीच"



531-"सैकड़ों परछाईयों के बीच"

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Monday, October 29, 2012 at 4:49pm ·
"सैकड़ों परछाईयों के बीच"


-खेत
वृक्ष
क्षितीज
और
मै भी .....
घूमने लग जता हूँ
जल के अनेक आईनों मे
सैकडो परछाईयों के बीच
 मै भी प्रतिबिम्ब सा -
खुशी -खुशी
देखता हूँ -
फ़ीर
झूमती
नाचती
प्रफुल्लित इस धरा कों
उस आकाश कों
पर्वतो कों स्पर्श करते से
घने बादलो कों
 परन्तु मै
किसी की मुस्कान
या
पीड़ा में
चाहकर भी
घुल नही पाता
 सम्मिलित नहीं हो पाता
प्रकृति के रंग की
हरियाली नहीं बन पाता
किसी व्यक्ति कों नहीं समझा पाता
कि
मै तुमसे जुदा नही
तुम ही हूँ
मै परछाई सा कटा हुआ
दर्पण से बाहर
पाँव रख नही पाता
और
इस तरह
शीशे के मन मे रह कर भी अंकित
अन्नंत रंगों से हो कर भी प्रभावित
मैं अछूता रह जाता हूँ
सच से .....
उसके महा आकार से
उसकी भव्यता से .....
 प्रयत्न भी करता हूँ
तो सत्य से पूर्व
भ्रमो के जाल से बना एक
कटघरा
मुझे
पाप और पुण्य
की
अजीब दुनियाँ  मे
ले जाकर
मेरी धज्जिया उड़ा  देता है
बेवजह
समय की उठी हुई
उंगलियों के आरोप ..प्रत्यारोप से ग्रसित
मै -तार तार हुआ
पुन:
अपने बढे हुए कदमो कों
वापस लिए
फिर ...
प्रतिबिम्बों के बीच
लौट आया करता हूँ
रोज
प्रेम या स्नेह कों
 सिर्फ ..स्वप्न मे ..
साकार देखने की कामना  लिए
 किशोर कुमार 

कोई टिप्पणी नहीं: