रविवार, 23 दिसंबर 2012

530-पगडंडियों की तरह



530-पगडंडियों की तरह

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Friday, October 19, 2012 at 1:01pm ·


प्रेम पथ पर
बहुत पीछे गया हूँ  मैं छूट
मानों तुम

गयी हो मुझसे रूठ

  देह हूँ  ,न मन हूँ 
यह अक्सर

कहती हो तुम

ठहरे हुए पेड़ की छाँव सा
निहारता हूँ सूनी राह को
क्षितिज सी पर

तुम हो मुझसे कोसों दूर

सुकुमार पंखुरियों के सदृश्य 
मेरे मन के भावों को
कैसे करूँ अब

तुम्हारे  सम्मुख मैं  प्रस्तुत

सुनहरी सुबह सा
बसा है मेरी आँखों में

तुम्हारा उज्जवल  रूप

परम मौन का तुम  हिस्सा हो
मेरे ह्रदय की वादियाँ ....
कहाँ पायेगी अब

तुम्हारी हँसीं से गूंज

पगडंडियों की तरह
आशाओं  के वन में फिर भी
भटकता रहूंगा
लेकिन नहीं पाउँगा कभी

मैं ..तुम्हे ढूढ़

लेकिन
तुम न कह देना प्रति उत्तर में मुझसे
हे प्रिये ..!

की जाओ "मुझे तुम भूल "
किशोर कुमार खोरेन्द्र

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