रविवार, 23 दिसंबर 2012

527-उदगम से ही....



527-उदगम से ही....

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Thursday, October 18, 2012 at 12:17pm ·



-कविता ....
लिखने मे
कितने ...
पन्ने लगे
कितनी उम्र
कितने दर्द ....
छने ....लगे

कई
जन्मो की
तपस्या ...
के बाद
जैसे
वो
मेरे अपने से 
लगने लगे

स्याही मिली
कलम मिला
कविता को
फिर  तुमसा
या
मुझसा
एक दुसरे के लिए 
पारखी
ढूढ़ना पड़ा 

आँसूओं  के दर्पण
में 
तब
करूणा के अक्स
उभरने लगे

कोई
कितना भी
कहें ...
लिखा जा चुका है सब
पर
रोज
हर शख्स ...
वेदना की
नयी -नयी
किताबों 
सा
छपने लगे

लिखने से
पहले
सबको ...
कितना  रटूं 
या
खुद को
सार्थक पंक्तियों सा
कब
कैसे
रचूँ 

वर्तमान के
विष
मे
अमृत सा ...
प्रेम का 
एक बूंद-शब्द 
मै ,और तुम
तलाशने लगे 

-कुओं  के
प्यासे अधरों को ....
सूखी माटी मे धंसें 
अन -अंकुरीत बीजो को ....
यह
देकर आश्वासन
कि .....
मुंहाने से भी लौटा लायेंगे

भागती नदी को
उदगम   से ही
जग रूपी ....अनाम
.....अथक
.....अन्तरंग
.......शाश्वत
प्रवाह के .....संग
मै
तुम
या ...हम सब
एक -एक
सजीव -तिनका
बन
बहने लगे ...

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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