रविवार, 23 दिसंबर 2012

526-यह है शाश्वत सत्य



526-यह है शाश्वत सत्य

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Thursday, October 18, 2012 at 11:08am ·



क्या यह हैं सच
कि
कोई एक ही
होता है वह शख्स
जो निभाता है आजीवन
किसी कवि की 
कविता ..पढ़ने  की  रस्म 
जो बदले में
कुछ नहीं चाहता
जिसे भाते हैं सिर्फ शब्द
ऐसे व्यक्ति होते है निष्पक्ष
वह साहित्य प्रेमी होता है 
कविता के मर्म को
समझता  है ..हो  तटस्थ 
काव्य में प्रेम के भाव भी होते हें 
जीवन दर्शन भी होते हैं 
हास्य के पुट  भी होते है 
रस के विभिन्न आयामो को 
करते है छंद ..अभिव्यक्त
पर मैं तो ऐसा कवि  हूँ
जो श्रृंगार पर ही
ज्यादातर लिखने का हूँ अभ्यस्त
स्त्री और पुरुष
एक दूसरे के बिना अधूरे हैं
यह है शाश्वत सत्य 
इसलिए जब तक सृष्टि हैं
प्यार की बाते नहीं होगी कभी खत्म
ऐसा नहीं है की
मेरे मन में असमान परिवेश जनित दर्द के लिए
न चलता हो द्वन्द 
पर  मेरा ह्रदय कोमल हैं
नैसर्गिक सौन्दर्य से
आकृष्ट हो
उससे  मैं  जाया करता हूँ   बन्ध 
किशोर कुमार खोरेन्द्र

कोई टिप्पणी नहीं: