रविवार, 23 दिसंबर 2012

525-रास्ते लौटने लगते है "



525-रास्ते लौटने लगते है "

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Wednesday, October 17, 2012 at 7:37pm ·



किसी
उपन्यास
के
सुखद अंत को
कोई
नही जी पाता
हर पल
कौरवो की भीड़ के साथ -
हमे
रौंदता  हुआ 
निकाल जाता है
सचमुच
सच के करीब
पहुँचने  से पहले
ही
रास्ते।।।  लौटने लगते है
सच
एक् जंगल की तरह है
जहाँ 
टूटकर
गिरते हुए  किसी पत्ते की आवाज
साफ सुनायी देती है
जहाँ 
उगता हुआ 
नन्हा
पौधा
सूरज को प्रणाम करते ही
यह जान जाता
है -की
इस
उजाले पर
सबका एक  समान  अधिकार है
सच..........?
जंगल की एक 
अनाम पगडंडी
की तरह है
जहाँ पर पहुंच कर
सारे आकार
निराकार हो जाते है

नाम ,न धर्म .....
यहाँ तक की मनुष्य
अपने कपड़ों  की तरह
अपनी देह को
भी
उतार कर
मुक्त होने लगता है
सभी से  वह ....
प्रेम करने लगता है
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

कोई टिप्पणी नहीं: