शनिवार, 22 दिसंबर 2012

521-मत रोको उसे



521-मत रोको उसे

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Wednesday, October 17, 2012 at 2:40pm ·
मत रोको उसे .......


 
१-मत रोको उसे
उस आदमी को
जो दर्द के पहाड़ से
लावे की तरह उतर रहा है
उसके
ओंठ......

सीले 
हुए  है
हाथ कटे हुए  है
पांवो मे बेड़ियाँ  है
उसकी देह मे दुःख के कांटें उग आये है
सारे अँधेरे को एकाकी होकर पीते आये
उस रक्त-तप्त ...
आदमी को -मत रोको



२-नदी के इस पार की
सारी पगडंडियों  पर
बिछे
हुए
करोडो
प्यास से सूखे
भूख से पीले
लडखडाते 
पत्तो को
इसी आदमी का इन्तजार है



३-नदी से कह दो
कि
वह
उसके रास्ते से हट जाए
उसका
तपा हवा मन
फिर 
कही पानी की तरह न बह जाए
उसे आने दो नदी के इस पार
सदीयों बीत गये
अब
उसकी आंच से सुलगने दो
जुटी हुई  पत्तीयों को
और एक् बार
समूचा
जल जाने दो जंगल को
पत्थरों की हीरे -जडीत आँखों को
उसकी आँखों के तेज से टकरा कर
चूर -चूर हो जाने दो
मनुष्यता को पराजित करते आये
पत्थरों के आशीर्वाद को
धुंवा बनकर उड़ जाने दो

समूल ढहने दो बरगद को
सुंदर दिख रहे
कीमती
सुरक्षित
सागौन के वृक्षो को
मत रोको उसे
वह
स्वयम ही एक् सही रास्ता है



४-जलने दो
जंगल को
फिर  आयेगा
मौसम
लिख जायेगा
नदी की रेत
पर खिची
हुई
पानी की लकीरों मे
नये अक्षर
नयी कविता
उसे मत रोको
जो
पहाड़ से
उतर रहा है

*किशोर कुमार खोरेन्द्र

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