शनिवार, 22 दिसंबर 2012

520-अनुगामी ....अनंत विचार "



520-अनुगामी ....अनंत विचार "

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Wednesday, October 17, 2012 at 2:14pm ·
अनुगामी अनंत विचार "
 
 तुमसा
किनारा
हूँ
या ......
अपना
सा
मंझधार ....?
  बह रहा प्रवाह मे
स्वयम ही
क्या
बन नाव और पतवार

मै नही जानता कुछ भी
शायद मेरा यह जन्म हो एक् लघु विराम
प्रश्न एक् है...........
अनुगामी ..अनंत विचार
 
तुम
कहते
बहते जाओ
लेकीन
सागर
करता हाहाकार
 
पानी
हवा
माटी
आग
और तुम
सब ....मुझमे
और इसलिए  मै सबमे ,तुममे
कभी तुम्हारे जुड़े का सुमन
तो कभी
वियोग के क्षणों का चुभता हुआ हूँ खार
आकाश से दिखती हैं
यह धरती
एक समान ,एक ही प्रकार 

इस बिंदु के वृत्त की परिधि
के
बाहर भी
क्या
मुझसा
तुमसा
बुझता -चमकता
है ....कोई संसार ..?
 जैसे।।।।।
दर्द की चांदी के आवरण से
लिपटा हुआ हो भीतर
तुम्हारा कंचन सा प्यार .
 किशोर कुमार खोरेन्द्र

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