शनिवार, 22 दिसंबर 2012

517-मुझ स्वपन को ...



517-मुझ स्वपन को ...

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, October 14, 2012 at 12:34pm ·
मुझ स्वपन को .....

-क्या
मै
ठीक ठीक ...वही  हूँ 
जो मै ....होना चाहता था
या
हो गया हूँ  वही ...
जो मै..... होना चाहता हूँ

काई को हटाते ही
जल सा स्वच्छ
किरणों से भरा उज्जवल
या
बूंदों से नम ,हवा मे बसी
मिट्टी की सुगंध
या -
सागौन के पत्तो से आच्छादित
-भरा-भरा सा सूना  हरा वन

-मै योगिक हूँ 
अखंड ,अविरल ,-प्रवाह हूँ 
लेकीन
तुम्हें याद करते ही -
वियोग  मे .....
टीलो की तरह
रेगिस्तान मे भटकता हुआ 
नजर आता हूँ


स्वयं  को कभी
चिता मे ...
चन्दन सा -जलता हुआ  पाता हूँ 


और टूटे हुए  मिश्रित संयोग सा
कोयले के टुकडो की तरह
यहाँ -वहां
खुद ही  बिखर जाता हू -सर्वत्र


लेकीन तुम्हारे प्यार की आंच से
तप्त लावे की तरह
बहता हुआ 
मुझ स्वपन को
पुन: ..साकार होने मे
अपने बिखराव को समेटने मे
क्या बरसो लग जायेंगे ......?

टहनियों पर उगे हरे रंग
या
पौधे मे खिले गुलाबी रंग
या
देह मे उभर आये -गेन्हुवा रंग


सबरंग..........
पता नही तुमसे
कब ...?...मिलकर
फ़ीर -थिरकेंगे मेरे अंग -अंग

किशोर कुमार खोरेन्द्र

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