शनिवार, 22 दिसंबर 2012

515-खत्म नही होती शायद यात्रा



515-खत्म नही होती शायद यात्रा

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Saturday, October 13, 2012 at 5:31pm ·
खत्म नही होती शायद यात्रा

कहानी मे
बच्चा सुनते -सुनते
ख़ुद बन जाता है खरगोश या कछुवा
लेकिन
सचमुच मे
जीवन की भाग -दौड़
खरगोश की तरह है -
तेज बहुत तेज
रफ्तार है जीवन की

जो बिछड़ जाते है
उन्हें
याद नही कर पाते
जो मिलते है उनसे भी
परिचय -नाम मात्र के लिए हो पाता है

किसी किताब के सारे पृष्ठों की तरह हम
दुसरो को क्या
स्वयम को भी पढ़ नही पाते
अपने नाम ,जाति  ,धर्म के आलावा
एक औरत या पुरूष के अतिरिक्त
भी तो कुछ होता होगा
एक व्यक्ति ....?

मनुष्य का सच
मन की गहराई मे कछुवे की तरह छिपा रह जाता है
जलते दीपकों के बीच
अगरबत्ती सी सुलगती रह जाती है
इंसान की पवित्रता

शरीर खरगोश की तरह
दौड़ता हुआ  पता नही
कहाँ
अदृश्य हो जाता है
और
शरीरी की कभी कछुवे की तरह
ख़त्म नही होती ..शायद यात्रा .
 किशोर कुमार खोरेन्द्र

कोई टिप्पणी नहीं: