शनिवार, 22 दिसंबर 2012

509-यात्रा के तीर्थ तक पहुंचना है ..



509-यात्रा के तीर्थ तक पहुंचना है ..

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Friday, October 12, 2012 at 6:56pm ·
यात्रा के तीर्थ तक पहुंचना है ..
 -बंद मुट्ठी के भीतर ..
मन को पेपर वेट की तरह ..
दबा रहा हू ...
सघनता और वजन को जैसे भांप रहा हू
फाइलों में छिपी आँखों को ..
खिड़की के उस पार ..खिले फूलो तक ..पहुंचाना  चाह रहा हूँ ...
-कुर्सी का कवर बन चुकी देह को ..अब नई कमीज की तरह सिलवा  रहा हू ..
शायद मै पेपर वेट ,फाइल या कुर्सी होने से बच जाऊ ...
और .चढ़ती हुई सीड़ियों  से ..अब उतर जाऊ ..
सिर्फ छपे हुए  नाम सा ..अख़बार में मै न रह जाऊं
एक बार ही सही ..कोट की तरह शरीर से उतर कर ..
किसी के आंसू ..रुमाल सा पोंछ पाऊ ....
और आंगन तक पहुंच आये ..दूबों से पूंछू .
कुंए  में  रीस आये ..नये जल से जानूँ ..
बबूल या धतूरे के पेडो से ब्याकुल खेतो के बारे में  ...
सुई की नोंक  से घायल कथरी को  ...ओढ़कर 
दिसंबर की रात में ..लौटती हुई ..ट्रेन के दरदो..के बारे में ...
क्या जीन्दगी सचमुच ...
दर्दों की  बोगियों को खींचती  हुई असमाप्त रेल यात्रा तो नही .....?
तो मुझे भी इस यात्रा के तीर्थ तक पहुंचना ही है ..
 *किशोर कुमार खोरेन्द्र

कोई टिप्पणी नहीं: