शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

500-निष्पाप होने का दंड दो

500-निष्पाप होने का दंड दो

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Tuesday, October 2, 2012 at 2:36pm ·


kishorkumarkhorendra द्वारा 14 नवंबर, 2009 
तुममुझे
-
गुनगुना रहे हो…. या तुम्हारी लिखी हुई

किसी एक कहानी को

मैं जी रहा  हूँ

या
अव्यक्त शब्दों की तरह
तुम्हारे मन  में अभिव्यक्त हुई
भावनाओं में ...अपने लिए
एक भावना तलाश रहा हूँ
पता नही तुम कौन हो ...?
जिसके इंतजार  में  मेरी नींद ...
जगी हुई  है
मुझे देख कर किसी ने
कुछ कहा नही अब तक सिवा कुछ मनुष्यों के -
जिन्हें मेरी जरुरत थी
अब  मैं किससे पुछू की -
मैं कौन हूँ आकाश ,नदी ,वृक्ष और प्रकाश 

बाहर से  ,भीतर से एक जैसे हैं

चारों  ओर केवल मौन है

मूक पदचापों की आवाज है
मैं घूम -फ़िर कर स्वयं को
संसार के कटघरे में
खड़ा  हुआ कयों पा रहा हूँ
मैं क्यो चाह रहा हूँ  -
की तुम आओ
मुझे -
निष्पाप होने का दंड दो
मैं  हूँ  इसलिए तुम .. भी हो या
तुम हो ....इसलिए मैं भी हूँ*
किशोर कुमार खोरेन्द्र

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