शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

488-मित्रवत रिश्ता




488-मित्रवत रिश्ता

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Tuesday, August 14, 2012 at 2:39am ·
तुमने दिया हैं मुझे
जो सिमित अधिकार
उस सीमा तक ही मै कर सकता हूँ
तुमसे व्यवहार
मेरे इस जीवन में तुम मेरे लिये
ईश्वर द्वारा मिला
एक हो उपहार
तुम खुद कों पढ़ सकती हो
मेरी कविताओं के द्वारा
उन्हें लिखने के उपरान्त
तुम ही कहती हो की
मै अपने मन की भावनाओं कों
शब्दों के जरिये अभिव्यक्त
कर पाने में हूँ निष्णात
दर्द तुम्हारा मुझे अपना सा लगे
ऐसे भी आते हैं
बातचीत के दौरान लमहात
मै कह  सकता हूँ साफ़ साफ की
मुझे पसंद हैं
तुम्हारे आकर्षक व्यैक्तित्व में ..
तुम्हारी रूह और उसका
जिस्म रूपी खूबसुरत परिधान
पर हम दोनों एक दूसरे के प्रति
कयों हैं बंधे बंधे से
मिल पाना कठिन हैं इसका
मेरी दृष्टी में उचित समाधान
इस पृथ्वी पर लोग बहुत मिलते हैं
पर कुछ ही ऐसे व्यक्ति होते हैं
लगता हैं जैसे कर रहें थे हम
उनका बरसों से इंतज़ार
और जिनसे उम्मीद रखते हैं की
यह ..मित्रवत रिश्ता बना रहें
आजीवन बरकरार
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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