शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

482-बबूल के बिखरे हुए कांटे




482-बबूल के बिखरे हुए कांटे

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Thursday, August 9, 2012 at 11:07am ·
एक बरगद का वृक्ष
उसके नीचे बैठे हुए लोग
एल फावड़ा
एक गैती
एल सब्बल
आस पास दूर दूर तक खेतों की हरियाली
बबूल के बिखरे हुए कांटे
नजदीक ही एक तालाब
और ..एक खुदती हुई नयी कब्र
यह वह जगह थी
जहाँ पर हम सोचना छोड़ देते हैं
जहाँ पर
प्रत्येक  क्षण घास के नुकीले पत्तों की तरह
चुभने लगते हैं
बादल ,रास्ते ,पत्ते ,नाले
रुके हुए से लगते हैं
जहाँ पर
बाहर से ज्यादा ..
भीतर का सोया हुआ एक मौन
जाग उठता  हैं ..
प्रशन वही ..यदि सभी कुछ नश्वर हैं
तो अनश्वर क्या हैं ..
बस इतना ही जानने के लिये
शायद हम जन्मे हैं ...?
नए बीज ,नए पौधे ,नयी कलिया ,नए फूल ,नए फल
पर स्वाद वही सदीयों पुराना ..
कुछ मीठा कुछ खट्टा
और प्रकृति के इस रंगमंच पर
चलते रहता हैं
इसी तरह एक सिलसिला
आना और  जाना
 किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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