शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

475-करना चाहती हो अभिव्यक्त



475-करना चाहती हो अभिव्यक्त

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Saturday, August 4, 2012 at 10:19am ·

न तुम्हें मुझसे
न मुझे तुमसे
हैं कोई शिकायत
तुम्हारी तरह मुझे भी
कविता  सृजन की हैं आदत

तुम्हारे काव्य अनुरागी मन के समक्ष
हूँ मैं ..नतमस्तक
अलग अलग दो शब्दों की तरह
हम दोनों
भावनाओं की महानदी में
बहते हुए मिले हैं यकायक

अपनी लेखनी से तुम
मनुष्यों में व्याप्त दर्द कों
करना चाहती हो अभिव्यक्त
और मै मिजाज़ से हूँ अलमस्त

इसलिए तुम पर ही
ज्यादातर लिखा करता हूँ नज्म
मुझे तुम कभी करुणा की
लगती हो मूरत
जब रोमानी हो जाता हूँ
चाँद सी लगती हैं
मुझे तुम्हारी ही सूरत

प्यार ही तो हैं वह किनारा
जिससे टकरा कर
आक्रोशित लहरे ....
अभावों के मंझधार में लौटने के लिये
हो जाती हैं विवश

वरना
दुखों से असयांमित
सागर के हज़ारों हाथो के द्वारा
कब की हो चुकी होती
इस इस्पाती सभ्यता की
ऊँची  ऊँची इमारते ध्वस्त
किशोर

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