शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

473-अंधेरों से मै घिर चुका हूँ



473-अंधेरों से मै घिर चुका हूँ

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Thursday, August 2, 2012 at 5:53pm ·
आसमान की खिडकियों
और सभी झरोखों
की आँखे बंद हैं
बल्ब की तरह जगागाते सितारों कों
विरह के  बादलों ने ढक लिया हैं
 दर्द की एक लम्बी सी सुरंग
या
तन्हाई की एक बड़ी सी गुफा
के अंधेरों से मै घिर चुका हूँ
मुझे अपना ही चेहरा  दिखाई नहीं दे रहा हैं
जबसे तुम ओझल हुई हो
इसी तरह के स्वप्न मुझे आते हैं
तुम्हारी आँखे मेरे लिये आईना थी
तुम्हारा चेहरा मेरे लिये चाँद था
लगता हैं मेरे शेष जीवन में अब अमावश ही अमावश हैं
मेरे पास न शब्द हैं न ही स्वर
अब मुझे समय की नदी
ठहरी हुई सी लगती हैं
अब मुझे रास्ते यू ही निरुद्देश्य
भटकते हुए से  लगते हैं ....
इस सौर्य मंडल में पृथ्वी के घुमने का
कोई अर्थ मुझे दिखाई नहीं देता हैं
इस ब्रम्हांड में
मै..... एक उड़ते हुए ....
सूखे  पत्ते की  तरह
बहुत अकेला हो चुका हूँ
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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