शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

464-सौन्दर्य पर मुग्ध थी




464-सौन्दर्य पर मुग्ध थी

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Tuesday, July 24, 2012 at 2:36pm ·
फूल जब तक रहा खिला
सुगंध उससे मुझे मिला
रंग में उसके दिन भर
मन मेरा उलझा रहा
मोहित कर गयी मुझे
उसकी कोमल पंखुरिया 
कभी
गुनगुनाता हुआ आता
हैं मधुप
कभी
कलियों कों
चूम लेती हैं तितलिया
प्यार उनका निहारने
फुनगी पर
चुपचाप बैठी हैं
देखो एक ढीट चिड़िया
पवन के झोंकों के विरुद्ध
संघर्ष करता हुआ
यह पुष्प ,वृंत पर
दृढ़ता से हैं रहा टिका
ठीक साँझ होने से पहेले
जड़ों के करीब
क्षत विक्षत मुझे वह दिखा
न फूल ,न उसकी पंखुरिया
न वे मधूप ,न वे तितलिया
न वह धूप ,न वह चिड़िया
जान पाए कि...
कयों एकाएक
अश्रुपूरित हो गयी हैं
सौन्दर्य पर मुग्ध थी
जो ..मेरी अँखियाँ
किशोर  कुमार खोरेन्द्र 

कोई टिप्पणी नहीं: