गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

458-तुमसे गुजारिश हैं



458-तुमसे गुजारिश हैं

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, July 22, 2012 at 12:22am ·
अब कतरे में सागर नहीं
सहरा हैं
जब से कोई फ़िराक
मेरे मन में आकर
ठहरा हैं
न हुश्न का चाँद हैं
न इश्क की चांदनी हैं
जमीं से आसमां तक
ऐ आलम ..
अमावश कितना गहरा हैं
बेगानों की तरह तुम
मुझसे ..इतनी दूर पर खडी होती हो
और ..
तुम्हारे साये पर भी पहरा हैं
ऐ शोख नदी ..
तुमसे गुजारिश हैं
फिर से लौट आओं
मुझे तो पर्वत से सागर तक
तुम्हारे संग बहना हैं
सहर होने से पहले
रोशनी की एक किरण तो दिखे
अनजान राहों पर मुझे
पुन:
तुम्हारे संग चलना हैं
किशोर  कुमार खोरेन्द्र 

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