गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

451-ओस का कण हूँ"



451-ओस का कण हूँ"

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Monday, July 16, 2012 at 6:28pm ·
"ओस का कण हूँ"


जिसकी छत हैं

यह नीला आसमान

वही हैं मेरा मकान

लौट आउंगा फिर

कल्पनाओं के अन्तरिक्ष से

इसके मुंडेर पर

अभी तो भरने दो मुझे उड़ान


यूँ तो मै कुछ भी नहीं

इस घरके विस्तार कों देखता हूँ

तो और भी लगा नहीं पाता हूँ

अपने होने का अनुमान

किसीकी नज़र में

पत्थर भी हैं भगवान

किसी की नज़र में

मै बदनाम हूँ

होकर एक इंसान


ओस का कण हूँ

पर ह्रदय में प्रेम का सागर हैं

करुणा की अश्रुपूरित लहरें करती हैं

मन के तट पर हाहाकार

अलग अलग शिविरों मैं

खेमों की अपनी अपनी दुनियाँ में

रहता हैं अहंकार

न मेरा कोई अतीत हैं

न मेरा कोई भविष्य हैं

मै तो हूँ सिर्फ

वर्तमान


प्रश्नों के उत्तर

यदि तुम खुद बन सकते हो

तो मेरे साथ चलों

तभी होगा

हम सबका जीना आसान


*किशोर कुमार खोरेन्द्र

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