गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

442-.नीरव के ..स्पंदनों सा



442-.नीरव के ..स्पंदनों सा
by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Friday, July 6, 2012 at 12:03pm ·

कोरा पन्ना भी



यदि उड़कर मुझ तक आता हैं



तो उसे मै पढने लगती हूँ



ऐसा लगता हैं जैसे तुमने



बिना लिखे ही बहुत कुछ लिख दिया हैं



समय की रेत पर मैं



तुम्हारी आकृति बनाने लगी हूँ



मालूम हैं लहरों की उंगलियाँ उसे मिटा देंगी



दिल की बात जुबान पर आते आते



अपने पाँव रोक लेती हैं



प्रेम कों अभियक्त करने के लिये



मेरे पास शब्द कहाँ हैं



मेरे बिना बोले



क्या तुम नहीं समझ सकते



पुष्प की सुगंध से



जैसे भंवरा उसकी ओर खीचा चला आता हैं



तुम भी तो मुझ तक आ सकते हो



पत्तों कों जैसे हवा की नर्म उंगलिया छूती हैं



तुम भी तो मुझे छू सकते हो



नदी में कूदकर जिस तरह से



भीतर भीतर उस पार पहुंचा जा सकता हैं



वैसे ही तुम भी तो



मेरी खातिर



प्यार के अथाह सागर में डूबकर



मेरी रूह तक ..पहुँच सकते हो



झिंगूर जब थक कर सो जाए



तब चांदनी की रश्मियों के धागों



में उलझे ..नीरव के ..स्पंदनों सा



मुझे ....



मुझमे तल्लीन होकर सुन सकते हो



किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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